मानव उत्कर्ष के परिपेक्ष्य में महाकाव्य रामचरितमानस में वर्णित नवधा भक्ति की व्यावहारिक जीवन में प्रासंगिकता
प्रांशु कुमार मौर्य1, निधि2
1असिस्टेंट प्रोफेसर - योग विभाग, देव संस्कृति विश्वविद्यालय, सांकरा, कुम्हारी दुर्ग - छत्तीसगढ़.
2पी. एच. डी रिसर्च स्कॉलर, काशी हिंदू विश्वविद्यालय - उत्तर प्रदेश.
*Corresponding Author E-mail: pranshumaurya9@gmail.com
ABSTRACT:
बड़े भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा।।
मानव जीवन एक बड़ा सौभाग्यशाली और अनमोल जीवन माना गया है। जो सभी प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ है, लेकिन इतना सौभाग्यशाली एवं इतनी प्रगति करने के बाद भी उसका जीवन हताशा, निराशा, घुटन, पीड़ा, पतन और पराभव से बीत रहा है। प्रत्येक प्राणी काम, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, तनाव, चिंता अवसाद आदि मानसिक विकारों से घिरा हुआ है। वह सुख शांति की कामना कर रहा है। जिससे दुखों से मुक्त होकर अपने जीवन लक्ष्य की प्राप्त कर सके। जिसके परिपेक्ष्य में तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में मानव उत्कर्ष के परिपेक्ष्य में नवधा भक्ति की व्यवहारिक व्याख्या बहुत ही सुंदर ढंग से की है। यदि व्यक्ति अध्यात्म का मार्ग अपनाकर नवधा भक्ति को अपने जीवन व्यवहार में अपनाता है। तो निश्चय ही उसका जीवन पतन, पराभव, संतापो, दुखों आदि से मुक्त हो जाएगा और प्राणी शीघ्र ही आनंद पूर्वक अपने जीवन लक्ष्य की प्राप्ति कर लेगा और नवधा भक्ति की साधना से प्राणी संसार सागर से मुक्त होकर परमात्मा चेतना में विलीन हो जाता है
KEYWORDS: नवधा भक्ति, दुखों से मुक्ति, मोक्ष प्राप्ति, सेवा साधना, संतों का संग एवं मंत्र जाप
INTRODUCTION:
मानव की संपूर्ण प्रगति और विकास उसके स्वास्थ्य जीवन पर निर्भर करती है। और अच्छा स्वास्थ्य मानव के व्यवहार पर निर्भर करता है क्योंकि व्यक्ति का व्यवहार उसके संस्कारों और आध्यात्मिक जीवन से विकसित होता है। जिसमें व्यक्ति के धर्म ग्रंथ, वेद, पुराण, उपनिषद्, एवं महापुरुषों द्वारा बताई गई शिक्षा आदि महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती है। इसी संदर्भ में श्री रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने मानव के व्यवहार को परिष्कृत एवं सुदृढ़ बनाने में नवधा भक्ति की व्यवहारिक व्याख्या बहुत ही सरल ढंग से अरण्यकांड मे की है। क्योंकि भक्ति भाव प्राचीन काल से ही मानव का एक अभिन्न महत्वपूर्ण अंग रहा है। जिससे सामान्य मानव भी श्रेष्ठ जीवन जीने में समर्थ हो सका। रामकृष्ण परमहंस, सूरदास, तुलसीदास, रविदास, नानक, कबीर, मीराबाई, आचार्य श्रीराम शर्मा, अनेकों संत महात्माओं ने अपने जीवन प्रगति का आधार भक्ति को बनाया और इसी से जीवन को सफल बनाया। परंतु वर्तमान समय में मानव भौतिकवादी जीवन को अधिक महत्व देने की वजह से भक्ति भाव, सेवा, उपासना आदि की कमी दिखाई देने लगी जिससे प्राणी का जीवन व्यवहार अनेक परेशानियों से घिरने लगा और आज का मानव पतन की राह पर भटक गया, साथ ही साथ आधि- व्याधि से भी घिर गया, और काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष आदि दुर्गुणों से मानव ग्राषित हो गया। भक्ति ही मानव के व्यवहार को परिष्कृत करके जीवन को उद्देश्य पूर्ण एवं सफल बना सकती है। भक्ति भावना से प्रेरित जीवन मानव में सुख, शांति, आनंद, आदर्श, आत्मविश्वास, शालीनता, उत्साह, उमंग, उल्लास, पवित्रता, प्रखरता, अनेक गुणों को विकसित करता है और प्राणी को परमात्मा से साक्षात्कार करा जीवन लक्ष्य की प्राप्त करता है। साथ ही प्राणी संसार के भाव बंधन से मुक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति कर लेता है, यही जीवन का लक्ष्य माना गया है।
भक्ति का स्वरूप -
भारतीय विचारधारा में जो स्थान ज्ञानयोग एवं कर्मयोग का है वही स्थान भक्तियोग का भी माना गया है। योग मानव के जीवन को श्रेष्ठ बनाने में सहायक है। उसी योग की एक धारा भक्तियोग के नाम से विकसित हुई। इसी भक्तियोग के माध्यम से मानव के जीवन में चरम पुरुषार्थ अर्थात मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।
भक्ति का अर्थ -
भक्ति शब्द संस्कृत व्याकरण के साहित्य विधा के भज् सेवयाम् धातु से त्किन् प्रत्यय लगाकर बनता है। जिसका अर्थ है निष्काम भाव से सेवा करना, पूजा करना एवं अच्छी संगति करना। यदि कोई व्यक्ति अपने ईश्वर के प्रति सहृदय भाव से अपार श्रद्धा एवं समर्पण प्रेम भाव रखता है तो वह साधक के द्वारा की गई सेवा ही भक्ति कहलाती है। जिसमें सांसारिक वस्तुओं से सर्वथा विरक्त होकर साधक निस्वार्थ भाव से दीन दुखी असहाय प्राणियों के प्रति समर्पण का भाव के साथ सेवा करता है।
नारद भक्ति सूत्र -
सा तस्मिन् परम् प्रेमरूपा 1/2
अर्थात - उस परमात्मा के प्रति अपार श्रद्धा भाव समर्पण भाव सेवा भाव तथा प्रेम भाव को रखना ही भक्ति है।
ईश्वर के प्रति लगाव जिसे सात्विक राग के नाम से जाना जाता है उसे ही भक्ति कहा गया है।
भक्तों के प्रकार -
भगवान श्री कृष्ण जी ने गीता में चार प्रकार के भक्तों का वर्णन किया है। जो भक्ति का मार्ग अपना कर अपने जीवन को सफल बनाते हैं।
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥ 7/16
आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी इन्हीं चार प्रकार के भक्त होते हैं जो ईश्वर की उपासना करते हैं, उन्हें भजते हैं, यही भक्त नौ प्रकार की भक्ति भी करते हैं।
आर्त भक्त - आर्तभक्त वे भक्त होते हैं जो किसी संकट आने पर असहाय अवस्था में भगवान को याद करते हैं। उनका पूजन स्मरण एवं वंदन करते हैं। उन्हें आर्तभक्त कहा जाता है। जैसे द्रोपती के चीरहरण के समय द्रोपती का श्री कृष्ण को याद करना उन्हें भजना।
अथार्थी भक्त - वह भक्त जो सांसारिक सुख धन-दौलत संपत्ति की भावना से ईश्वर की भक्ति करते हैं जो भौतिक जीवन में सुख पूर्वक जीवन यापन करने के लिए ईश्वर का भजन करते हैं उन्हें अथार्थी भक्त कहा जाता है जैसे धन दौलत रोजगार नौकरी पाने हेतु की गई भक्ति।
जिज्ञासु भक्त - ऐसे भक्त जो ईश्वर को ब्रह्म एवं आत्मज्ञान के साथ-साथ अध्यात्म को जानने की इच्छा से ईश्वर का भजन पूजन करते हैं। इसमें ईश्वर की सर्व सत्ता को जानने समझने का प्रयास किया जाता है। सत्य ज्ञान को जानने के लिए की गई भक्ति। जैसे भक्त प्रहलाद की भक्ति जिज्ञासु भक्ति के अंतर्गत आती है।
ज्ञानी भक्त - ज्ञानी भक्त सबसे सर्वोच्च स्तर के साधक होते हैं। जो सत्य ज्ञान की प्राप्ति करके ईश्वर संसार जीव जगत माया आदि के संदर्भ में महत्वपूर्ण ज्ञान प्राप्त कर निस्वार्थ भाव से भगवान की भक्ति करते हैं। सेवा करते हैं।
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः।।17।।
उनका अंतः करण सत्य ज्ञान से ही ब्रह्म की प्राप्ति कर लेता है। ऐसे ज्ञानी भक्त कहलाते हैं जो श्रीकृष्ण को सबसे परम प्रिय माने गए हैं
रामचरितमानस में वर्णित नवधा भक्ति के प्रकार एवं उसकी व्यवहारिक व्याख्या -
तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के अरण्यकांड के अंतिम भाग में शबरी को जीवन से मुक्ति पाने के लिए नवधा भक्ति की सरल व्यवहारिक व्याख्या की है। जो सामान्य मानव भी आसानी से अपना कर अपने जीवन को सफल बना सकते हैं। नवधा भक्ति का उपदेश भगवान श्री रामचंद्र जी ने शबरी की सेवा से प्रसन्न होकर दिया था। शबरी ने कहा कि हे भगवन मैं नीच अधम कुल जाति की हूं मुझे ज्ञान नहीं है कि इस संसार से मुक्ति का मार्ग क्या है। उस प्रभु की आराधना कैसे करूं तब शबरी को प्रभु ने नवधा भक्ति का विस्तार से वर्णन किया जो प्राणी के व्यवहार को परिष्कृत कर संसार के भाव बंधनों से मुक्त कराने में सहायक है। और उसे ईश्वर की प्राप्ति करा ब्रह्म चेतना में एकाकर कराने में सहायक है ।
नवधा भक्ति -
नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं। 3/33/4
भगवान श्री रामचंद्र जी ने कहा हे माता शबरी मैं तुम्हें नवधा भक्ति की महिमा के बारे में कहता हूं जिसे आप सावधान होकर ध्यानपूर्वक सुनो और इसे ग्रहण कर व्यवहार में आत्मसात करो यह भक्ति तुम्हें संसार से मुक्त कराने में सहायक सिद्ध होगी यह नौ प्रकार की भक्ति को मैं कह रहा हूं।
1. प्रथम भक्ति -
संतों का संग - सत्संग।
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। 3/33/4
हे मां शबरी पहली भक्ति संतों की संगति करना सत्संग करना, सत्संग ही व्यक्ति का भाव बंधन को भंग करके उसे सन्मार्ग उज्जवल भविष्य की ओर ले जाने में सहायक है। सच्चे संत महात्मा, गुरुजन उन सब की संगति करने से प्राणी को माया बंधन से मुक्ति मिलती है। और उनमें सदाचार संयम शील, सहिष्णुता, दया, करुणा परोपकार जैसे गुण विकसित होते हैं। जो व्यक्ति को सेवामय जीवन जीने की कला सिखाती है। जैसे कहा गया है।
बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥
सतसंगत मुद मंगल मूला। सोई फल सिधि सब साधन फूला॥4॥
सत्संग से ही विवेक की जागृति होती है। विवेक से ही सही गलत का निर्णय कर पाने में व्यक्ति सफल होता है। विवेक की प्राप्ति प्रभु की संगति, अच्छी संगति, सत्संग से होती है। तभी जीवन प्रगति की ओर अग्रसर होता है। और प्राणी उस ब्रह्म चेतना में विलीन हो जाता है। बिना सत्संग के जीवन की दुर्गति हो जाती है।
भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी ।।
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता । सत संगति संसृति कर अंता ।।
क्योंकि संतो का संग करने से हिंसक मन भी हिंसा को त्याग कर देता हैं झूठे व्यक्ति झूठ को त्याग कर देते हैं, और सत्यव्रत धारण कर लेते हैं। बुरे व्यक्ति बुराइयों को त्याग करके अच्छाइयों को धारण कर लेते हैं। संतों का संग मानव जीवन में पारस पत्थर के समान होता है। जिसके संपर्क में आने पर अनघगढ़ व्यक्ति भी शुगढ़ बन जाता है। मानव महामानव बन जाता है, जैसे लोहा स्वर्ण में बदल जाता है इसलिए भगवान श्री रामचंद्र जी ने संतों की संगति को प्रथम भक्ति और सर्वश्रेष्ठ भक्ति माना है।
2. द्वितीय भक्ति -
दूसरि रति मम (प्रभु) कथा प्रसंगा ।। 3/33/4
नवधा भक्ति की दूसरी भक्ति में भगवान श्री रामचंद्र जी ने शबरी को उस प्रभु, ईश्वर की कथाओं लीलाओं के गुणों को सुनना बताया तथा उनमें अभिरुचि रखने के लिए कहा क्योंकि प्राणी की सबसे अधिक चपल कर्णेन्द्रिय तथा वाकेन्द्रिय, दृश्य इंद्रिय आदि को माना गया है। जिससे अधिक बोलता देखता और सुनता है। जो व्यक्ति सुनता है। उसे अधिक महत्व देता है।
स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः ॥ 2/44 ॥
स्वाध्याय कथाओं लीलाओं का जो अनुसरण अनुपालन कर तथा व्यवहार में अपनाता है। और उसी के प्रति अनुरागी भी हो जाता है। अच्छे गुणों बातों संस्कारों को जो व्यक्ति सुनता है और वैसा ही अपने व्यवहार को भी डालने का प्रयास करता है। साथ ही साथ मर्यादित जीवन भी जीता है। इसलिए अच्छी बातें सुनकर व्यक्ति का भी आचरण, कर्म, व्यवहार, आदतें भी सकारात्मक हो जाती हैं। और व्यक्ति बुरे कर्मों को त्याग कर परमात्मा चेतना में विलीन हो जाता है।
3. तीसरी भक्ति -
अभिमानरहित होकर गुरु के चरण कमलों की सेवा करना
गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान ।। 3/35
भगवान श्री रामचंद्र जी ने तीसरी भक्ति के अंतर्गत माता शबरी को गुरु की सेवा के रूप में बतलाया। जिसमें गुरु के कमल रूपी चरणों की सेवा करने की बात कही। गुरु की सेवा ही व्यक्ति को संसार के सभी भव बंधनों से मुक्त रखती है। उसकी सेवा में किसी प्रकार की कोई छल कपट नहीं होना चाहिए। तथा अभिमान रहित सेवा करनी चाहिए। क्योंकि गुरु को भगवान से भी बड़ा बताया गया है जैसे कि कबीर दास ने कहा
गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताय।।
अर्थात देव के रूप में ही साक्षात गुरु विद्यमान होते हैं। जो शिष्य को उचित मार्गदर्शन समय-समय पर देकर कठोर तप करा करके चमकता हुआ हीरा बनाते हैं। गुरु की सेवा करने से ज्ञान में वृद्धि भी होती है। तथा प्राणी के दुर्गुणों का नाश भी होता है।
गुरू बिन ज्ञान न उपजै, गुरू बिन मिलै न मोष।
गुरू बिन लखै न सत्य को गुरू बिन मिटै न दोष।।
गुरु सेवा कोई उपकार नहीं होता बल्कि उनके प्रति दृढ़ विश्वास भाव रखकर सेवा की जाती है। साधक को अहंकार का भाव त्यागकर निष्कपट भाव से श्रद्धा पूर्वक गुरु की सेवा करनी चाहिए। क्योंकि गुरु ही अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने में समर्थ होता है। और अपने शिष्य को श्रेष्ठ उन्नतशील जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है। गुरु ही अनघड़ से सुघड़ बनाता है और उसे श्रेष्ठ मार्ग की ओर प्रेरित करता है।
4. चौथी भक्ति -
कपट का त्याग करके प्रभु के गुणों का गान करना।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान ॥ 3/35
चौथी भक्ति के रूप में श्री रामचंद्र जी ने कपट का त्याग करके प्रभु ईश्वर के गुणों का संकीर्तन भजन भक्ति स्वरूप गुणगान करने को कहा। साथ ही साथ श्रेष्ठ शास्त्र सम्मत कथा करना भजन के माध्यम से गुणगान करने की बात कही। जिससे साधक का चित्त निर्मल तथा प्रेम भाव से परिपूर्ण हो जाता है। क्योंकि ईश्वर सद्गुणों का समुच्चय माना गया है। उसके पास कोई बुराई नहीं है। जैसा कि महर्षि पतंजलि ने कहा है।
क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥ 1/24 ॥
ईश्वर सभी प्रकार के क्लेश दुख कर्म कर्म फल सभी से मुक्त है और सभी प्रकार के पुरुषों में सर्वश्रेष्ठ और विशेष हैं।
इसलिए जब ईश्वर के स्वरूप का गुणगान संकीर्तन के माध्यम से किया जाता है। तब प्राणी का चित्त निर्मल होने लगता है। उसके जीवन व्यवहार में पवित्रता, प्रखरता, मर्यादा तथा सद्गुण आने लगते हैं। उसका जीवन पवित्र निर्मल बन जाता है। और वह सर्व प्राणी मात्र में ईश्वर का स्वरूप देखने लगता है। सभी के प्रति अच्छा व्यवहार करने लगता है। और सभी प्रकार के छल कपट हिंसा चोरी झूठ को त्याग कर देता है। हमेशा के लिए द्वेष भाव का त्याग कर देता है।
निर्मल मन हो तो रघुनायक शबरी के घर जाते।
श्याम सूर की बांह पकड़ साग विदुर घर खाते।।
ऐसा निर्मल पवित्र मर्यादित ज्ञानवान साधक ही ईश्वर ही संपूर्ण जगत को प्रिय होता है इसलिए ईश्वर के गुणों का ध्यान करना, गुणगान करने से साधक को शीघ्र ही मुक्ति हो जाती है। वह मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। इसलिए जब हम ईश्वर के गुणों को ध्यान करते हैं उनके गुण हमारे जीवन में आने लगते हैं, और हमारा जीवन उस परमात्मा स्वरुप के समान बन जाता है।
5. पंचम भक्ति -
दृढ़ विश्वास के साथ प्रभु नाम के मंत्र का जाप करना
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा ॥ 3/35/1
भक्ति के प्रकारों की शृंखला में श्री रामचंद्र जी ने मां शबरी को पांचवी भक्ति के रूप में दृढ़ विश्वास के साथ प्रभु के नाम का जप, प्रभु के नाम के मंत्र का जाप करने को कहा। साथ ही साथ जो वेदों पुराणों उपनिषदों में दैवीय, लौकिक, प्रसिद्ध मंत्र, ईश्वर के नाम का मंत्र जाप दृढ विश्वास के साथ करना चाहिए। यही पांचवी भक्ति मानी गई है। ईश्वर आराध्य को भक्त अपने अनुकूल जिस नाम से पुकारते हैं, संबोधित करते हैं, वही मंत्र बन जाता है, और साधक जब दृढ़ विश्वास के साथ मंत्र का जाप करता है।
सुमिरन सों मन लाइए जैसे नाद कुरंग । कहैं कबीर बिसरे नहीं, प्राण तजे तेहि संग ॥
तब साधक का मन एकाग्र होकर चित्त की वृत्तियों से निरुद्ध हो जाता है। तब चित्त निर्मल होकर अपने आराध्य की चेतना में, सेवा, भजन, के रुप में लीन हो जाता है। और साधक के व्यवहार में पवित्रता, प्रखरता, मर्यादा, सचरित्रता आदि सद्गुणों विकास होने लगता हैं। जिससे साधक उस परमात्म चेतना में एकाकार हो जाता है। साधक इस संसार सागर से मुक्त हो जाता है। क्योंकि मंत्र में बहुत शक्ति होती है। जिसे यदि श्रद्धा भाव से उल्टा भी जपा जाए, तो भी उसका श्रेष्ठ प्रभाव पड़ता है। जैसा कहा गया है,
उल्टा नाम जपत जग जाना बाल्मीकि भए ब्रह्म समाना।
मंत्र का जब जाप किया जाता है, तब मंत्र के उच्चारण करने पर हमारे शरीर के सभी चक्रों पर उसका प्रभाव पड़ता है। मंत्र अपने बीच अक्षरों की झंकार से समस्त ग्रंथियों का भेदन करने में सहायक है, क्योंकि मंत्र में ब्रह्मांडीय चेतना का निवास होता है। इसलिए मंत्र और शब्द को ब्रह्म कहा गया है, शब्दों वै ब्रह्म अर्थात शब्द ही ब्रह्म है। और मंत्र के बीज अक्षर शटचक्रो की ऊर्जा को प्रभावित करके उनका जागरण कर मानवी क्षमताओं को विकसित करके सामान्य मानव को महामानव बना देती है। जिस भाव से मंत्र का जाप किया जाता हैं वैसे ही साधक में गुणों का विकास होता है। इसलिए प्रभु के मंत्र का जाप दृढ़ विश्वास के साथ करने पर प्रभु के गुण साधक में प्रवेश कर जाते हैं और साधक उसी ईश्वरीय चेतना में ब्रह्मलीन हो जाता है।
6. छठी भक्ति -
इंद्रियों का निग्रह तथा सज्जनोंचित धर्म का आचरण करना ।
छठ दम सील बिरति बहु करमा । निरत निरंतर सज्जन धरमा ।। 3/35/1
छठी भक्ति के रूप में भगवान श्री रामचंद्र जी ने मां शबरी को इंद्रियों के निग्रह के संदर्भ में बताया जिसमें पंच ज्ञानेंद्रियां तथा कर्मइंद्रियां और मन इन सभी की आसक्ति का बलपूर्वक त्याग करना, दमन करके शीलवान, सदाचारी, संयमी की तरह सज्जन व्यक्ति की तरह, उचित धर्म का अनुसरण, पालन करना चाहिए। यही छठी भक्ति है। इंद्रियों का निग्रह करना अति आवश्यक है। क्योंकि इंद्रियों की स्वाभाविक गति विषयों, चंचलता वासना, तृष्णा, अहंता की ओर होती है। और जब साधक व साधारण व्यक्ति इंद्रिय निग्रह नहीं कर पाता तब उसमें विषयों की ओर आसक्ति बढ़ जाती है। जिससे वह विषयों से आसक्त हो जाता है, और जिससे उसमें विभिन्न प्रकार के मानसिक विकृतियां उत्पन्न होती हैं। यह शक्ति बढ़ने पर उसमें यदि विघ्न उत्पन्न होती है, तो व्यक्ति में लोभ, मोह के साथ-साथ क्रोध, अज्ञान, मूढ़ भाव उत्पन्न होने लगता है, क्रोध के बढ़ने पर मनुष्य की स्मृति शक्ति भ्रमित हो जाती है, और उसकी सोचने समझने की शक्ति का ह्रास होने लगता है, जिस व्यक्ति की सोचने समझने की स्थिति बिगड़ जाती है, वह व्यक्ति पागलों की तरह व्यवहार करने लगता है, ऐसे व्यक्ति मृत शरीर के समान हो जाते हैं, इसलिए गीता के दूसरे अध्याय मे बताया गया है।
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते । सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥॥2-62॥
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥॥2-63॥
इसलिए इंद्रियों का निग्रह प्रत्याहार जप साधना, ध्यान साधना आदि से करना अत्यंत आवश्यक है। साथ ही साथ सात्विक आहार लेने से वाणी, विचार नियंत्रित हो जाते हैं। इंद्रियों का निग्रह करके सज्जन व्यक्ति, धार्मिक व्यक्ति की तरह जीवन यापन करना चाहिए। सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए। अध्यात्म और धर्म का पालन करना चाहिए। तभी व्यक्ति सद्गुणों से परिचित होकर शीलवान कहलाता है। और यह शीलता की प्रतिष्ठा सज्जनों जैसा आचरण को अपनाने से बढ़ती है। और व्यक्ति श्रेष्ठ जीवन की ओर बढ़ने लगता है। इसलिए व्यक्ति को इंद्रिय निग्रह एवं सज्जनों जैसा धर्म का अनुसरण के रूप में छठी भक्ति का पालन करना चाहिए। जब व्यक्ति धर्मानुसारण करता है। और वह संसार के सभी भव बंधनों से मुक्त होकर सभी प्राणियों में परमात्मा के स्वरूप को देखने लगता है। और अंत में वह परमात्म चेतना को समर्पित हो कर ब्रह्मलीन हो जाता है।
7. सातवी भक्ति -
सभी प्राणियों में समभाव की दृष्टि रखना।
सातवां सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा ॥3/35/2
सातवीं भक्ति के रूप में श्री रामचंद्र जी ने प्रकृति में समव्याप्त पशु, पक्षी, जीव, चराचर जगत सभी में ईश्वर का स्वरूप मानकर प्रेम करुणा, दया , समभाव से देखना तथा उसकी सेवा करना, उसकी आराधना करना, सभी के साथ प्रेम भाव से रहना सातवी भक्ति के रूप में बताया गया है। किसी के प्रति द्वेष भाव न रखना क्योंकि समस्त प्रकृति में ईश्वर का निवास है प्राणी मात्र पर समान दृष्टि रखना चाहिए और जिनका चित्त, शुद्ध, निर्मल हो पवित्र हो जिनकी विचार प्रखर है। जिनका सादा जीवन उच्च विचार से संबंधित हो, उन संतों को सर्वोपरि मानकर सद्व्यवहार और सेवा करना ही सातवी भक्ति मानी गई है। प्रेम एवम समभाव दृष्टि व्यक्ति में क्रोध घृणा, पाप, दोष को दूर करता है। क्योंकि समस्त सृष्टि और शक्तिशाली परमात्मा से उत्पन्न है। संसार के सभी कण-कण में उन्हीं की शक्तियां व्याप्त हैं। उस परमात्मा की प्रेरणा से ही संचालित होती है ।
ईशावास्योपनिषद -
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम॥
ईश्वर की कृपा से ही संपूर्ण तत्व प्रभावशील और क्रियाशील होते हैं। इसलिए संपूर्ण जगत में ईश्वर की सत्ता को प्रत्येक जीव में अनुभव करना चाहिए और सभी को ईश्वर का स्वरूप मानकर जीवन निर्वाह करने के साथ ही साथ सभी जीव चराचर के प्रति प्रेम पूर्वक व्यवहार करना तथा जो संत हैं उनके प्रति कृतज्ञ रहना क्योंकि संत
संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना॥
निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर सुख द्रवहिं संत सुपुनीता॥4॥
संत हृदय से कोमल और पवित्र होते हैं। उनमें ईश्वर का वास होता है। उनकी सेवा ही सातवी भक्ति है जो प्राणी के व्यवहार को परिष्कृत करके मुक्ति दिलाती है। और व्यक्ति सभी के साथ प्रेम भाव के साथ रहते रहते वह परमात्मा चेतना में विलीन होकर मोक्ष को प्राप्त हो जाता है।
8. आठवी भक्ति -
संतोष करना तथा दूसरों में दोषों को ना देखना
आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा ।। 3/35/2
आठवीं भक्ति में संतोष पूर्वक जीवन जीना और दूसरो में दोषों को देखने की प्रवृत्ति का त्याग करना ही आठवीं भक्ति बताई गई है। भगवान श्री रामचंद्र ने मां शबरी को संतोष की साधना तथा उससे होने वाले लाभों के बारे में बताया व्यक्ति को उसकी समझदारी, इमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी और मेहनत से जो धन दौलत मिले उसी में ही खुश रहना चाहिए। जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है ऐसी भावना रखना चाहिए। अत्यधिक प्राप्त करने की इच्छा का त्याग कर देना चाहिए। यही संतोष कहलाता है, यही संतोष सबसे बड़ा सुख लाभ माना गया है। जैसा कि महर्षि पतंजलि ने कहा
संतोषादनुत्तमसुखलाभः ॥ 2/42 ॥
संतोष को ही परमसुख लाभ माना गया है क्योंकि मनुष्य की इच्छाएं अनंत होती हैं यह कभी समाप्त नहीं होती व्यक्ति को तृप्त नहीं कर पाती क्योंकि इच्छाएं मन में चंचलता को जन्म देती हैं। जिससे एक के बाद एक बढ़ती रहती है। व्यक्ति के जीवन में अशांति का कारण इन चंचलता और असंतोष ओं को माना गया है। व्यक्ति को नाना प्रकार की परेशानियों से गुजरना पड़ता है और व्यक्ति का जीवन नारकीय बन जाता है संतोष से परमसुख का लाभ मिलता है साथ ही साथ व्यक्ति को दूसरों में दोषों को देखने की प्रवृत्ति का त्याग कर देना चाहिए सभी में अच्छे विचारों गुणों को देखकर उन्हें धारण करना चाहिए। बुरे विचारों दुर्गुणों को दूसरे में देखने से संयम में बुराइयां आने लगती हैं। दूसरों में दोषों को देखने से चित्त मलिन होने लगता है। इसलिए स्वयं के दोषों का अवलोकन कर उन्हें दूर करके अपने व्यवहार को परिष्कृत करना चाहिए कभी भी भूल कर भी सपने में भी किसी के दोषों को नहीं देखना चाहिए। उनमें कमियां नहीं देखनी चाहिए। संतोष पूर्व जीवन व्यतीत करना चाहिए, यही आठवीं भक्ति है। जैसा संत कबीर ने कहा
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय ।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय ।।
संसार में सभी व्यक्ति में बुराइयां व्याप्त रहती हैं। किंतु अपने दोषों को नहीं देखता जिस दिन व्यक्ति अपने दोषों को देखकर उनको दूर करने का प्रयास करता है। और सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करता है। संतोष पूर्वक जीवन व्यतीत करता है। यही भक्ति है और इससे व्यक्ति संसार में प्रसन्नता पूर्वक जीवन निर्वाह करते हुए परमात्मा में विलीन हो जाता है।
9. नौवीं भक्ति -
हृदय में सरलता एवं छल कपट का त्याग करना।
नवम सरल सब सन छलहीना । मम भरोस हियँ हरष न दीना ॥
नव महुँ एकउ जिन्ह के होई। नारि पुरुष सचराचर कोई ॥ 3/35/3
नवी भक्ति के रूप में भगवान श्री रामचंद्र जी ने सब के प्रति सरलता का व्यवहार करना, प्रेम, दया, करुणा, स्नेह आदि का भाव रखना चाहिए। किसी के प्रति कभी भी कठोर अपशब्द जैसा गलत व्यवहार नहीं करना चाहिए। साथ ही साथ प्राणियों के प्रति छल, कपट, धोखा जैसे व्यवहार एवं भावों का त्याग कर देना चाहिए। शांत वातावरण का निर्माण करना चाहिए। जीवन को सुख दुख की घटनाओं से नहीं बांधना चाहिए। यही नौवीं भक्ति है। सरलता से मानव के हृदय में प्रेम, स्नेह, सदाचार जैसे गुणों का विकास होता है। जिससे उसका व्यवहार सबको प्रिय लगने लगता है। और सभी को प्रसन्नता पूर्वक साथ लेकर चलता है। क्योंकि मानव ईश्वर पर पूर्ण विश्वास के साथ जीवन जीने की कोशिश करते हुए जीवन में सफलता को प्राप्त हो जाता है।
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहि ।
प्रेम गली अति साँकरी, ता में दो न समाय ॥
छल कपट का त्याग करने से उनके कर्म संस्कारों एवं व्यवहारों में पवित्रता, विचारों में प्रखरता आती है। और वह उत्कृष्टता की ओर बढ़ने लगता है। क्योंकि बुरे कर्मों का बुरा परिणाम मिलता है। ईश्वर ऐसे बुरे कर्मों का बुरा परिणाम देता है बुरे कर्म मानव को पतन, पीड़ा, पराभव तथा घोर अंधकार की ओर ले जाते हैं। और नाना प्रकार के दुखों को भोगना पड़ता है। मानव का जीवन नर्क बन जाता है। सभी उसके प्रति घृणा करने लगते हैं। उसका कोई सम्मान नहीं रह जाता, जीवन नीरस बन जाता है। कोई उसका साथ नहीं देता व्यक्ति का व्यक्तित्व एवं व्यवहार दोनों छल कपट से रहित होना चाहिए। उससे सरल स्वभाव एवं प्रखर पवित्र मर्यादित होना चाहिए। यही व्यवहार उसके दुखों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कराने में सहायक है।
यही नौवीं भक्ति है। जिसको प्रत्येक व्यक्ति को अपनाना चाहिए तभी उसका कल्याण तथा समाज का कल्याण हो सकता है। और व्यक्ति जब सरल हृदय का होता है। तब उसका हृदय नवनीत के समान माना जाता है। सभी उससे स्नेह रखते हैं। और वह समाज में सम्मानीय दृष्टि से देखा जाता है। जो एक प्रखर और उचित जीवन के लिए सही माना गया है। तभी सभी प्रकार के दुख नष्ट हो जाते हैं। और व्यक्ति परमात्म चेतना में विलीन हो जाता है।
निष्कर्ष
अतः इस प्रकार तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के अरण्यकांड में व्यक्ति के व्यवहार को परिष्कृत करने वाली नवधा भक्ति की महिमा का व्यावहारिक वर्णन किया। जिसमें श्री रामचंद्र जी ने माता शबरी को नवधा भक्ति का ज्ञान दिया जिसे अपनाकर सबरी धन्य हो गई। यदि नवधा भक्ति का वर्तमान में यदि कोई व्यक्ति अपनाता है। तो निश्चय ही उसका परम लाभ अवश्य मिलेगा क्योंकि नवधा भक्ति में संतों का संग, प्रभु की भक्ति, प्रभु के गुणों का गान, मंत्र का जाप, इंद्रियों का निग्रह, छल कपट का त्याग, सरलता आदि। सद्गुणों से युक्त होने के कारण सामान्य मानव आसानी से इसे अपना सकता है। और अपना जीवन व्यतीत कर व्यवहार को आसानी से परिष्कृत करके सन्मार्ग की ओर जीवन को ले जाया जा सकता है। साधक नवधा भक्ति को अपनाते हुए दुखों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर सकता है। और इस संसार में प्रेम पूर्वक जीवन व्यतीत कर सकता है । इसलिए नवधा भक्ति वर्तमान समय में उतनी ही प्रासंगिक है जितनी प्राचीन समय में थी।
सन्दर्भ सूची
1- हनुमान प्रसाद पोधार, श्रीरामचरित मानस, घनश्यामदास जालान, गीताप्रेस गोरखपुर, अरण्यकाण्ड, पृष्ट 646 3/33/4
2- हनुमान प्रसाद पोधार, श्रीरामचरित मानस, घनश्यामदास जालान, गीताप्रेस गोरखपुर, अरण्यकाण्ड, पृष्ट 646 3/34 1,2, 3
3- महार्षि पतञ्जलि, योगदर्शन, गीता प्रेस गोरखपुर, उ0 प्र0, पृष्ट- 26, 70, 71
4- संत चेतन दास, कबीर के दोहे, श्री सरस्वती प्रकाशन, अजमेर, पृष्ट-6
5- श्रीमद्भगवत गीता, गीता प्रेस गोरखपुर, श्लोक 2/62, पृष्ट 47
6- श्रीमद्भगवत गीता, गीता प्रेस गोरखपुर, श्लोक 2/63, पृष्ट- 47
7- श्रीमद्भगवत गीता, गीता प्रेस गोरखपुर, श्लोक 17/15, पृष्ट- 103
8- संपादक “श्रीराम शर्मा आचार्य, अखण्ड ज्योति पत्रिका, दिसम्बर 1998, पृष्ट- 20
9- श्रीराम शर्मा आचार्य, 108 उपनिषद, ज्ञानखण्ड, युरा निर्माण योजना विस्तार ट्रस्ट, मथुरा- 201003 ईशावास्योपनिषद् मंत्र- 1, पृष्ट- 34
10- पुस्तक गीत सुमन, युग निर्माण योजना विस्तार ट्रस्ट गायत्री’ तपोभूमि मथुरा- 201003 पृष्ट- 127
11- रामायण की प्र्रगतिषील प्रेरणाए, युग निर्माण योजना विस्तार ट्रस्ट गायत्री’ तपोभूमि, मथुरा- 201003
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Received on 27.04.2023 Modified on 20.05.2023 Accepted on 02.06.2023 © A&V Publication all right reserved Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2023; 11(2):107-115. DOI: 10.52711/2454-2687.2023.00016 |